भारत और जापान का परमाणु समझौता

इन दिनों हमारे प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदीजी जापान की तीन दिन की यात्रा पर है। यह यात्रा दोनों देशों के लिए आर्थिक और राजनितिक तौर पर बहुत महत्त्वपूर्ण है। वैसे तो प्रधानमंत्री कई मुद्दों को ले कर इस यात्रा पर गए है। लेकिन इन सभी मुद्दों में से परमाणु समझौते पर पूरी दुनिया की नजर रहेगी।

अमरीका के द्वारा दूसरे विश्व युद्ध में न्यूक्लियर बम से पीड़ित जापान ने कई सालों से भारत के साथ न्यूक्लियर शक्ति से सम्बंधित सौदे करना बंद कर दिया था क्योंकि भारत ने परमाणु हथियार से सम्बंधित संधि करने से इनकार कर दिया था। इस संधि के अनुसार संयुक्त राष्ट्र के स्थायी सभ्य देशों के अलावा अन्य देशों पर परमाणु हथियार विकसित करने पर प्रतिबन्ध लगाया जाता था।

हाल के दिनों में दक्षिण एशिया में समीकरण बदल चुके है। चीन के बढ़ाते हुए वर्चस्व को कम करने के लिए अब जापान को भारत जैसे देशों की मदद की जरुरत है। उसी तरह भारत को भी जापान की अद्यतन टेक्नोलॉजी की ज़रूरत है। इस लिए अपना सख्त रुख छोड़ते हुए जापान भारत के साथ परमाणु समझौता करने के लिए तैयार है।

इस समझौता की नींव सालों पहले रख दी गई थी। लेकिन विभिन्न कारणों से इस समझौते को ठोस रूप नहीं दिया जा सका था। कई मंत्रणाओं, नियमों में बदलाव और जापान के प्रधान मंत्री शिंजो अबे की भारत यात्रा के बाद आखिर में दोनों देश इस समझौते के लिए राज़ी हुए है। हो सकता है कि इस शुक्रवार को इस समझौते पर दोनों देशों के प्रधानमंत्री अपने हस्ताक्षर कर दें।

जापान को उम्मीद है कि इस समझौते के तौर पर भारत परमाणु शक्ति का जिम्मेदारी पूर्वक उपयोग करेगा और दक्षिण एशिया में शांति कायम करने में मदद करेगा।

इस समझौते में भारत के लिए कई फायदेमंद सौदे है। लेकिन अगर भारत आगे कोई परमाणु बम्ब परिक्षण करता है तो यह समझौता रद्द हो जाएगा। जापान के अलावा भारत ने ऐसा समझौता अमरिका, फ्रांस और ऑस्ट्रेलिया के साथ भी किया है। यह समझौता इस ऊर्जा के आभाव के समय में भारत के लिए एक ऐतिहासिक सौदा साबित हो सकता है।

  • यहाँ पर इस समझौते के कुछ महत्त्व के मुद्दों को बताया गया है।
  • इस समझौते के अनुसार जापान भारत को न्यूक्लियर रिएक्टर, ईंधन और टेक्नोलॉजी मुहैया करायेगा।
  • दक्षिण भारत में जापानी कंपनी तोशिबा द्वारा 6 न्यूक्लियर रिएक्टर की स्थापना की जा सकती है।
  • इस समझौते की मदद से भारत 2032 तक परमाणु शक्ति के उत्पादन को 10 गुना बढ़ा सकता है।
  • भारत के लिए यह एक बड़ी जीत है क्योंकि भारत को यह समझौता परमाणु अप्रसार संधि पर दस्तखत न करने पर भी मिल रहा है। यह दर्शाता है कि भारत का महत्त्व दक्षिण एशिया में दिन ब दिन बढ़ रहा है। भारत ने परमाणु अप्रसार संधि को इसलिए स्वीकारने से इनकार किया है क्योंकि पकिस्तान और चीन परमाणु हथियार विकसित कर रहे है।
  • चीन के बढ़ते वर्चस्व और डोनाल्ड ट्रम्प का अमरीका के राष्ट्रपति के तौर पर चुना जाना भी इस समझौते के लिए महत्त्व के कारण हो सकते है।

यह समझौता अगर सफल रहा तो वो भारत की विकास गाथा में एक नीव का पत्थर साबित होगा।

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