मोहम्मद अली: इतिहास का एक दिव्य चरित्र

aliमहानतम बोक्सर! जिसके मुक्कों का जवाब किसी के पास नहीं था! जिसकी तेजी को कोई पहुँच नहीं पाता था! यही पहचान है मोहम्मद अली की, जिन्होंने बॉक्सिंग के इतिहास और लोगो के दिलों मे हमेशा के लिए जगह बना ली है।

मोहम्मद अली का जन्म 17 जनवरी 1942 में, लुइसविल में हुआ था। उनका सही नाम केसियस मार्सेलास क्ले जूनियर था। 12 साल की उम्र में उन्होंने बॉक्सिंग की शुरुआत की। उसके बाद कभी उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।

अगले 6 सालो में उन्होंने 6 केंट की गोल्डन ग्लव्स प्रतियोगिता, 2 नॅशनल गोल्डन ग्लव्स प्रतियोगिता और 2 नॅशनल एमेच्योर एथलेटिक यूनियन टाइटल जीते! सिर्फ 18 साल की छोटी उम्र में उन्होंने 1960 में रोम में हुए ओलिम्पिक खेल की लाईट वेट कक्षा में स्वर्ण पदक हासिल किया। हांलाकि उनकी सफलता का सफ़र बिलकुल आसान नहीं था। स्वर्ण पदक मिलने के बावजूद, उनके रंग के कारण उन्हें कोई नौकरी नहीं दे रहा था। कुछ लोगों का कहना है की उन्होंने इस बात से गुस्से में आ कर अपना पदक नदी में फेंक दिया था। 36 सालो बाद उनको उनका पदक वापिस दिया गया और 1993 के एटलांटा में होने वाले ओलिम्पिक खेल की मशाल जलाने के लिए आमंत्रित किया गया। ओलिम्पिक के बाद उन्होंने पेशेवर खेल शुरू किया और निरंतर 19 लड़ाइयाँ जीती!

1964 में ब्रुटिश लिस्टन को हरा कर वह पहली बार हेवी वेइट चैम्पियन बनें। इस प्रतियोगिता के बाद उन्होंने मुस्लिम धर्म का स्वीकार किया और उसके एक साल के बाद अपना नाम बदल कर क्ले से मोहम्मद अली रख दिया।

उनका कहना था- “केसियस क्ले एक गुलाम का नाम है। यह मैंने नहीं चुना था और मुझे यह नहीं चाहिए। मैं मोहम्मद अली हूँ, एक आज़ाद नाम-जिसका मतलब है “अल्लाह का प्यारा”- और मैं चाहता हूँ की जब भी लोग मुझसे बात करें या मुझे याद करें, तो इसी नाम का प्रयोग करें।” उनके मुस्लिम धर्म का स्वीकार करना और नाम बदलना बहुत से लोगो को पसंद नहीं था लेकीन वह अपने निर्णय पर डटे रहे।

उनकी जिंदगी में एक मोड़ ऐसा भी आया जब उनसे उनका पासपोर्ट और बॉक्सिंग लाइसंस छीन लिए गए। उन्होने विएतनाम के युद्ध में देश के लिए लड़ने से इनकार कर दिया था, जिसका यह परिणाम था। उनका मानना था की विएतनाम के लोगों से उनकी कोई दुश्मनी नहीं थी। इस काल के दौरान उन्होंने विज्ञापनों से मिलने वाले बहुत सारे पैसे गवाए। यह उनके लिए कठिन समय था।

आखिरकार 1970 में एक जज के द्वारा उन्हें पेशेवर बॉक्सिंग की अनुमति दे दी गई। बॉक्सिंग से लम्बी दूरी ने उनके खेल पर गहरा असर किया था। फिर भी वह मुकाबले जीतने में सफल रहते थे। लेकीन 1971 में उस समय के अपराजित चेम्पियन जो फ्रेज़र के हाथो हार झेलनी पड़ी, जो नरंतर 32 जीतों के बाद पहली हार थी।

इस हार के बाद उन्होंने और भी मुकाबले जीते जिसमे से एक जो फ्रेज़र पर मिली जीत भी शामिल थी। 1981 में उन्होंने 56 जीत के बाद आखिर सन्यास लिया। उनके सन्यास के बाद उनका संघर्ष पर्किन्सोनिस्म की बिमारी के विरुद्ध चालू रहा। बोक्स़र में आम पाई जाने वाली यह बिमारी उनको बाकी की जिंदगी परेशान करती रही।

अली सिर्फ एक बोक्स़र ही नहीं थे। उन्होंने 1986 शान्ति के राजदूत की भूमिका भी निभाई थी। 1997 में उन्हें नोबल शान्ति पुरस्कार के लिए नामित किया गया था। उन्होंने अपनी प्रसिद्धि को जरुरत मंदों के लिए दान इकठ्ठा करने में और दुनियाभर में गरीबों के लिए खाना और स्वास्थ्य सुविधाए उपलब्ध कराने में उपयोग किया। 1998 में उन्हें यूनाइटेड नेशन्स के द्वारा “शान्ति के दूत” के पद से नवाजा गया।
पार्किंसन्स से जूझते हुए इस महान शख्सियत ने 3 जून 2016 को आखरी साँस ली। दुनिया इन्हें एक योद्धा, दानी और शान्ति के दूत के रूप में हमेशा याद रखेगी!

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