राजनैतिक दलों को पार्टी चिन्ह कैसे मिलता है

जन संख्या के मामले में भारत दुनिया का सबसे बडा जनतंत्र है। यहाँ पर असंख्य राजनैतिक दल हर साल अलग अलग स्तर के चुनाव लड़ते है। इन सभी दलों को एक एक चुनाव चिन्ह दिया जाता है जो हर दल के लिए अनूठा होता है। इस चिन्ह के दो फायदे है। भारत में कम साक्षरता के कारण कई लोग मत डालते वक्त अपनी पसंद के राजनैतिक दल का नाम नहीं पढ़ पाते। ऐसे लोग आसानी से चुनाव चिन्ह देख कर अपने पसंद के दल को पहचान लेते है। यह चुनाव चिन्ह का एक महत्वपूर्ण फायदा है। इसके अलावा हर चुनाव चिन्ह अपने दल की मुख्य विचारधारा को भी व्यक्त करता है जोकि उसका दूसरा फायदा है।

हर दल या चुनावी उम्मीदवार किस तरह से चुनाव चिन्ह प्राप्त करता है उसके पीछे भी दिलचस्प कहानी है। चुनाव के वक्त चुनावी उम्मीदवार को चुनाव आयोग द्वारा एक चुनावी चिन्ह दिया जाता है। यह चिन्ह दो प्रकार के होते है। आरक्षित और मुक्त। आरक्षित चिन्ह वे है जो कुछ राष्ट्रिय या राज्य स्तर के दल के लिए आरक्षित किये गए है। जैसे कि भारतीय जनता पार्टी का चिन्ह कमल का फूल है और कांग्रेस का चुनावी चिन्ह पंजा है। इस दल के हर उम्मीदवार को यही चुनाव चिन्ह दिया जाता है। हर वो चिन्ह जो आरक्षित नहीं है, उन्हें मुक्त चिन्ह कहा जाता है और कोई भी स्वतंत्र उम्मीदवार या दल इसका उपयोग कर सकता है।

पुराने समय में चुनाव आयोग उम्मीदवारों और दलों को प्राणी एवं पक्षियों को चिन्ह के तौर पर उपयोग करने देता था। लेकिन बाद में पशु अधिकार समूहों के द्वारा विरोध होने पर अब ऐसे चिन्ह नहीं रखने दिए जाते। उनका कहना था कि प्राणी या पक्षी का चिन्ह के तौर पर उपयोग करने पर रेलियों के दौरान उनपर सख्ती की आशंका रहती है। मुक्त चिन्हों की बड़ी सूची चुनाव आयोग हर उम्मीदवार को देता है जिसमें से वो कोई भी चिन्ह का चुनाव कर सकता है खुद के लिए। इस चुने गए चिन्ह को और किसी भी उम्मीदवार या पार्टी को नहीं दिया जा सकता। आज जो चिन्ह मुक्त रूप से प्राप्त है उनमें रोजाना उपयोगी चीजें जैसे की अलमारी, ट्रांजिस्टर, बल्ला, गुब्बारा, डबलरोटी, बैटरी इत्यादि है।

यह निश्चित किया जाता है कि कोई भी उम्मीदवार या दल ऐसा कोई चिन्ह पसंद ना करे जिससे किसी धार्मिक समूह की भावनाओं को चोट पहुंचे।

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