वैदिक काल के दौरान महिलाएं

वेदकाल में स्त्रियों की सामाजिक स्थिति महत्वपूर्ण थी, उन्हें समाज और घर पर सम्मान मिलता था |उनको शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार था | परिवार की सम्पत्ति में उन्हें बराबर का हक़ था | समितियों व सभा में आजादी से भाग लेती थी हालाँकि ऋगवेद में कुछ अनुमान है जो स्त्रियों के विरोध में दिखाई देती हैं |

वेदकाल की स्त्रियों की तुलना में आज की स्त्रियों से करे तो वेदकाल से अब तक स्त्रियों की ज़िन्दगी में बहुत बदलाव आया है,आज की स्त्रियों राजनीती, कारोबार, कला और नौकरियों में पहुंचकर नए पैमाने गढ़ रही हैं | आंकड़ों के अनुसार प्रतिवर्ष कुल उम्मीद्वारों में 50 प्रतिशत महिलाऐं डाक्टरी की परीक्षा उत्तीर्ण करती हैं। आजादी के बाद अधिकतर १२ स्त्रिया अलग अलग राज्यों की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं।

भारत के प्रमुख साफ्टवेयर व्यवसाय में 21 प्रतिशत पेशेवर महिलाऐं हैं। फौज, राजनीति, खेल, पायलट तथा व्यवसाय सभी क्षेत्रों में स्त्रियों पहुँच चुकी हैं | कुछ सालों पहले स्त्रियों का यहाँ तक पहुंचने की कल्पना भी नहीं की जा सकती | वहां पर स्त्रियों ने अपने आप को स्थापित ही नहीं किया हैं बल्कि वहां पर सफल भी हो रही हैं।

भारत में स्त्रियों की स्थिति हमेशा एक जैसी नहीं रही है | इसमें युग के अनुसार महत्वपूर्ण परिवर्तन आये हैं | वेदकाल और उत्तर वेदकाल में स्त्रियों को  प्रतिष्ठित स्थान प्राप्त था। उसे देवी, सहधर्मिणी अर्द्धांगिनी, सहचरी माना जाता था। उनकी स्थिति में वेदकाल से लेकर आधुनिक कल तक बहुत उतार-चढ़ाव आये हैं, और उनके अधिकारों में परिस्थिति के अनुसार बदलाव आया है|

मैत्रयीसंहिता में स्त्री को झूठ का अवतार कहा गया है। ऋगवेद का कथन है कि स्त्रियों के साथ कोई मित्रता नही है, उनके हृदय भेड़ियों के हृदय हैं। ऋगवेद के अन्य कथन में स्त्रियों को दास की सेना का अस्त्र-शस्त्र कहा गया है। स्पष्ट है कि वैदिक काल में भी कहीं न कहीं स्त्रियाीं नीची दृष्टि से देखी जाती थीं। फिर भी हिन्दू जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में वह समान रूप से आदर और प्रतिष्ठित थीं। शिक्षा, धर्म, व्यक्तित्व और सामाजिक विकास में उसका महान योगदान था। संस्थानिक रूप से स्त्रियों की अवनति उत्तर वैदिककाल से शुरू हुई।

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